केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी के मानकीकरण का कार्य देश के प्रतिष्ठित विद्वानों और भाषाविदों, हिंदी सेवी संस्थाओं, राज्य सरकारों एवं विभिन्‍न मंत्रालयों के उच्‍च अधिकारियों से विचार-विमर्श करके प्रारंभ किया गया तथा इसके अंतर्गत प्रथमत: 1967 में “हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” नाम से लघु पुस्तिका प्रकाशित की गई थी। वर्ष 1983 में इस पुस्तिका का संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण “देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” प्रकाशित किया गया। इस पुस्तिका की लगातार बढ़ती हुई माँग को देखते हुए वर्ष 1989 में इसका पुनर्मुद्रण कराया गया तथा विभिन्‍न हिंदी सेवी संस्थाओं, कार्यालयों, शिक्षण संस्थानों में इसका नि:शुल्क वितरण कराया गया ताकि अधिक-से-अधिक संस्थाओं में हिंदी के मानक रूप का प्रयोग बढ़े। राजभाषा हिंदी के संदर्भ में सभी मंत्रालयों, राज्यों, सरकारों, शैक्षिक संस्थाओं एन.सी.ई.आर.टी, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं आदि ने भाषा में एकरूपता लाने के लिए इस मानकीकरण को आधिकारिक रूप से अपनाया। वर्ष 1967 के मानकीकरण का मुख्य आधार प्रयोक्‍ता और टंकण यंत्र रहा था। नवीन सूचना प्रौद्योगिकी के युग में हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि तथा वर्तनी के मानकीकरण को पुन: संशोधित और परिवर्धित करने की आवश्यकता महसूस की गई। कंप्यूटर में उपलब्ध विभिन्न सॉफ्टवेयर और फॉन्टों के कारण हिंदी भाषा में कार्य करने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इन समस्याओं के समाधान के लिए यूनीकोड तैयार किया गया।

संविधान की आठवीं अनुसूची में स्वीकृत भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में भी लिखा जा सके इसके लिए विकसित परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला में पहले कुछ ही भाषाओं के लिए विशेषक चिह्न बनाए गए थे। अद्यतन स्थिति के अनुसार भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ शामिल हैं। तदनुसार इस पुस्तिका में जिन भाषाओं की विशेष ध्वनियों के लिए विशेषक चिह्न सम्मिलित नहीं हैं, उन्हें विकसित करने का कार्य भी किया गया है। इसका संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण वर्ष 2016 में प्रकाशित किया गया।

देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण का यह संस्करण हिंदी भाषा के आधुनिकीकरण, मानकीकरण और कंप्यूटरीकरण के क्षेत्र में नई दिशा प्रशस्त करेगा।

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